द्वारकाधीश मंदिर, गुजरात में स्वामी निशांतानंद जी ने विधिवत दीक्षा ग्रहण की
मानवता एवं समाज सेवा के लिए जीवन समर्पण
द्वारका (गुजरात):
गुजरात के पावन द्वारकाधीश मंदिर में आज एक अत्यंत पवित्र, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण का साक्षात् हुआ, जब स्वामी निशांतानंद जी ने विधिवत संन्यास दीक्षा ग्रहण कर सांसारिक मोह-माया का त्याग करते हुए अपना संपूर्ण जीवन मानवता, समाज सेवा और आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
यह दिव्य अवसर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि समाज को सेवा, त्याग और नैतिक मूल्यों का गहन संदेश भी प्रदान करता है।
पूर्ण वैदिक विधि से सम्पन्न हुआ दीक्षा संस्कार
स्वामी निशांतानंद जी का यह संन्यास दीक्षा संस्कार पूज्य पुजारी दीपकभाई ठाकर जी द्वारा पूर्ण वैदिक मंत्रोच्चारण एवं परंपरागत विधि-विधान से सम्पन्न कराया गया।
मंत्रध्वनि, शंखनाद और भक्ति से ओत-प्रोत वातावरण ने पूरे द्वारकाधीश मंदिर परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
प्रतिष्ठित साक्षियों की उपस्थिति ने बढ़ाई गरिमा
इस पावन दीक्षा समारोह के साक्षी बने:
- डॉ. मधुकर दवे
- मयंक शर्मा
- ज्योति वर्मा (ज्योतिषाचार्या)
सभी साक्षियों ने स्वामी निशांतानंद जी के इस महान आध्यात्मिक निर्णय पर हर्ष व्यक्त किया और इसे समाज के लिए एक प्रेरणादायी कदम बताया।
समाज सेवा और मानव कल्याण ही जीवन का लक्ष्य
दीक्षा ग्रहण करने के उपरांत स्वामी निशांतानंद जी ने अपने संदेश में कहा कि—
“अब मेरा प्रत्येक क्षण धर्म, सेवा, मानवता और समाज उत्थान के लिए समर्पित है।”
उन्होंने आगे बताया कि वे:
- समाज में आध्यात्मिक जागरूकता फैलाएंगे
- युवाओं का मार्गदर्शन करेंगे
- नैतिक मूल्यों और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देंगे
- जरूरतमंदों एवं वंचित वर्ग की सेवा को अपनी साधना का आधार बनाएंगे



द्वारकाधीश मंदिर से मिला मानवता का संदेश
द्वारकाधीश मंदिर में सम्पन्न यह दीक्षा समारोह समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत बनकर सामने आया। इस आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि—
“मानवता की सेवा ही जीवन का सर्वोच्च धर्म है।”
स्वामी निशांतानंद जी का यह आध्यात्मिक पथ न केवल धार्मिक समुदाय के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए आशा, सेवा और समर्पण का प्रतीक है।


