मानव इतिहास के अनगिनत चक्रों में समय अपने आप को दोहराता आया है—कभी प्रकाश का दौर आता है, तो कभी अंधकार का।
द्वापर युग के उत्तरार्ध में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब पृथ्वी, जिसे वेदों में “भूमि देवी” कहा गया है, अत्याचारों और अधर्म से बोझिल हो उठी।

राजाओं के हृदय से करुणा लुप्त होती जा रही थी,
बलवान कमजोरों को रौंद रहे थे,
और महादानव—आसुरी प्रवृत्तियों के प्रतीक—मानव समाज में भय भर रहे थे।

धरती पर बढ़ती पीड़ा अब किसी पुकार से कम नहीं थी।


भूमि देवी का विलाप

अत्यंत दीन अवस्था में, पृथ्वी एक दिव्य गौमाता के रूप में ब्रह्मलोक पहुँची।
उसके चरण धूल से ढके थे; आँखों में आँसू, हृदय में वेदना।

उन्होंने ब्रह्मा के समक्ष विलाप किया—

“हे सृष्टिकर्ता!
मेरी धारण शक्ति समाप्त हो रही है।
राजाओं की क्रूरता, असुरों की शक्ति और अधर्म की बढ़ती छाया ने मुझे दुर्बल कर दिया है।
राक्षसों ने मृत्यु के भय से बचने हेतु मानव रूप ले लिया है और पृथ्वी पर घोर अत्याचार कर रहे हैं।
मेरी रक्षा कीजिए, वरना प्राण ही निकल जाएँगे।”

ब्रह्मा ने गंभीरता से सुना।
उनकी आँखें चिंता से गरज उठीं, क्योंकि यह समस्या साधारण नहीं थी;
अधर्म का संकट पूरे संसार को निगलने की क्षमता रखता था।


 देवताओं की सभा

ब्रह्मा, पृथ्वी को साथ लेकर देवलोक पहुँचे जहाँ देवगण भी इसी संकट से विचलित थे।
वरुण, इंद्र, अग्नि, पवन—सभी असुरों की हिंसा से पीड़ित थे।
स्वर्ग और पृथ्वी दोनों ओर अराजकता ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं।

इसलिए ब्रह्मा देव सभी देवताओं को लेकर क्षीरसागर के किनारे पहुँचे—वह दिव्य स्थल जहाँ भगवान विष्णु योगनिद्रा में विराजमान रहते हैं।

देवताओं ने सामूहिक प्रार्थना की,
पृथ्वी ने अपने आँसुओं से विनती की,
और ब्रह्मा ने भगवान से उत्तर माँगा।


क्षीरसागर में दिव्य प्रकाश

अचानक क्षीरसागर की शांत लहरों से अलौकिक प्रकाश प्रकट हुआ।
उस प्रकाश में एक मधुर, आश्वस्ति देने वाली आवाज गूँज उठी—वह स्वयं श्री हरि विष्णु का संदेश था:

“धैर्य रखो, देवताओं।
अधर्म का विनाश निश्चित है।
मैं स्वयं अवतरित होकर पृथ्वी का भार दूर करूँगा।
याद रखो—जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है,
मैं लोक-कल्याण के लिए मानव रूप धारण करता हूँ।”

यह वही महान प्रतिज्ञा थी जो युगों-युगों से धर्म का आधार रही है—
यदा यदा हि धर्मस्य…

विष्णु ने आगे कहा—

“मैं वृष्णि कुल में देवकी और वसुदेव के घर जन्म लूँगा।
मेरा अंश सभी देवता यदुवंशी कुल में जन्म लें।
मुझे सहायता देने को तत्पर रहो,
क्योंकि यह अवतार केवल एक राजा को मारने के लिए नहीं,
बल्कि सम्पूर्ण विश्व में संतुलन स्थापित करने के लिए होगा।”


कंस का उदय — अधर्म की छाया

उधर पृथ्वी पर मथुरा का अत्याचारी राजा कंस अपने आतंक से लोगों को भयभीत कर रहा था।
वह शक्तिशाली, परंतु घमंडी और निर्दयी था।
भविष्यवाणी की चेतावनियों से डरकर उसने अपनी ही बहन देवकी को बंधक बना लिया था।

इसी कंस के घोर पापों,
उसकी नींव के नीचे दबते धर्म,
और हृदयों में भरते भय
ने संसार को विष से भर दिया था।

देवता जानते थे—

यदि धर्म को बचाना है,
तो कृष्ण का आगमन अनिवार्य है।


अवतार की तैयारी

विष्णु के संदेश के बाद समस्त ब्रह्मांड मानो एक नए ताल-मेल में जुड़ गया।
देवताओं ने विभिन्न यदुवंशी परिवारों में जन्म लेने की तैयारी की।
योगमाया को आदेश दिए गए कि वे दिव्य लीला की पटकथा तैयार करें—
कौन कब मिलेगा, कौन किस परिस्थिति में भाग लेगा,
और किस लीला में कौन-सा चमत्कार प्रकट होगा।

हर घटना, हर संयोग, हर व्यक्ति—
सब कुछ इस महान अवतार के लिए नियोजित हो रहा था।

पृथ्वी की पुकार का उत्तर मिल गया था।
क्षीरसागर में प्रतिध्वनित वह दिव्य वचन अब सत्य बनने वाला था।


अध्याय का समापन – आशा का उदय

जब देवता लौटे, तो पृथ्वी के चेहरे पर नई रोशनी खिल उठी।
अधर्म का अंधकार अभी भी फैला था,
लेकिन अब उसे मिटाने वाली दिव्य प्रभात निकट थी।

हर दिशा में केवल यही संदेश गूँज रहा था—

“अवतार का समय आ गया है।
वह आएगा।
धर्म की रक्षा हेतु
विष्णु स्वयं बाल रूप में अवतरित होंगे।”

पृथ्वी ने लंबी साँस ली—
युगों की पुकार सुनी जा चुकी थी।
अब संसार कृष्ण नाम की दिव्य बाल-लीला के उदय की प्रतीक्षा कर रहा था।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

131

Related Posts